Monday, 7 September 2015

दूरियां

आजकल न जाने वो मुझसे
क्यों दूरियां बनाने लगे है,
मेरे आग्रहों पर भी अब वो
असहज होकर झल्लाने लगे है।

मुझसे दो बात करे इतना वक्त
उनके पास अब है कहां ?
कुछ मेरी भी सुने पर अब
वो सुनने को है तैयार कहां ?

उनकी हर बात में अब जिक्र
किसी और का होने लगा है,
उनके दिल में किसी नई
प्रतिमा का चित्रण होने लगा है।

चमक-दमक के आकर्षण में
शायद राही का इरादा बदल गया,
लगता है जैसे मन्दिर का पुजारी
या पुजारी का खुदा बदल गया।

-- Umrav Jan Sikar

Saturday, 5 September 2015

काश मेरे नर्म अहसासों से

काश मेरे नर्म अहसासों से,
तेरे मन का दर्प पिघल जाता।
बंधे थे इक अदृश्य डोरी से,
वो रिश्ता तो आखिर बच जाता।

पतंगे की तरह जलकर मरा, 
दीपक सी लौ कर पाता।
रुखसत होना ही था दुनिया से,
तेरे लिए तो कुछ कर पाता।

बरबाद तुमने ऐसे ही किया,
मैं खुद ही तबाह हो जाता।
स्वार्थों की बलि चढ़ाया मुझे,
तेरे लिए मैं खुद आहुत हो जाता।

गर मेरे दिल की सिसकियों से,
हृदय तेरा द्रवित हो जाता।
उम्र भर बेचैन रहा पर
अन्तिम नींद तो चैन की सो पाता।

-- Umrav Jan Sikar