Monday, 15 June 2015

खुशियाँ

खुशियां

मैं दोड़ता रहा हर तरफ
खुशियों की तलाश में,
लेकिन खुशियां कभी
हासिल हुई नहीं।
मैं हर बार पहुंचता
खुशियों के करीब,
पर पास जाते ही
खुशियां ओंझल होती गयी।
मेरी कल्पनाओं में खुशियां थी
स्वर्ग से सुख के समान,
वह मेरा भ्रम था।
मै देखता हूँ
कई दर्दों के नीचे
दबी हुई है हर खुशी।
अफसोस !
ज्यादा की उम्मीद में
मैं दूर होता गया
अपनी सीमित खुशियों से।
अब दिन रात एक किये बैठा हूँ
उन सीमित खुशियों को
पुन: हासिल करने के लिए।

-- उमराव सिंह राजपूत (Umrav Jan Sikar)

कितना अच्छा था वो दौर पागलपन का

वो दौर था पागलपन का
जब एक प्रेम-पुष्प
खिलकर दिल में महका
मुहब्बत को मैंने रब समझा।
अब समझदारी के दौर में
दिल की कोमलता मिट गई
भावनाओं की कद्र घट गई
स्वार्थपरता बढती गई
खुदगर्जी के ताने बुनता रहा
रिश्तों के धागे चटकते गये
उस दौर में जो हासिल हुआ
टूटकर सब बिखरते गये
तब थी मुहब्बत रब जैसी,
अब पैसा रब बन गया
हां मैं समझदार बन गया।
कितना अच्छा था
वो दौर पागलपन का..!!

-- उमराव सिंह राजपूत (Umrav Jan Sikar)

Thursday, 14 May 2015

हालात

बदन है पसीने से तर-बतर
थकान भरा दिन का सफर
शाम को जब आता हूँ घर पर
असंतोष के भाव होते है चेहरे पर।
धीरे-धीरे रात की काली चादर गहराती है
सारी हलचलें खामोशी में तब्दील हो जाती है
कोई नजर नहीं आता,गलियां सूनी पड़ जाती है
जब नींद सबको स्वपन लोक की सैर कराती है।
मैं भी अपने दड़बे में चुपचाप लेट जाता हूँ
आँखें मूंदकर सोने का प्रयास करता हूँ
मन ही मन हालातों की पेचीदगी का आकलन करता हूँ
अंधकार में डूबे अपने भविष्य की फिक्र करता हूँ।
तब नींद रूठकर उल्टे पांव वापस चली जाती है
सन्नाटा तोड़ती धड़कन की आवाज कानों में टकराती है
चिन्ताएं साथ छोड़ती नहीं, परेशानियां कभी घटती नहीं
भयानक दानव की तरह मजबूरियां पीछे हटती नहीं।

-- उमराव सिंह राजपूत (Umrav Jan Sikar)

Wednesday, 13 May 2015

बिल्ली पहरेदार

बिल्ली पहरेदार

न्यायालय की बात का, सब करते सम्मान।
तन्त्र यहाँ भी रुग्ण है, निर्धन का अपमान।।

राशि जमानत की नहीं, भोग रहे हैं जेल।
देखा सबने न्याय का, पैसों के संग खेल।।

मन्दिर जो इन्साफ का, रग रग भ्रष्टाचार।
दूध भला कैसे बचे, बिल्ली पहरेदार।।

अधिवक्ता जितने बडे, उतना ज्यादा दाम।
बस पैसे पर न्याय है, निर्धन के बल राम।।

दौलत के आगे सुमन, झुकने का दस्तूर।
पत्रकारिता भी झुकी, न्यायालय मजबूर।।

--- श्यामल 'सुमन'

Friday, 1 May 2015

श्री हनुमानाष्टक

बाल समय रवि भक्ष लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अँधियारो
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो
देवन आनि करी विनती तब,
छांड़ि दियो रवि कष्ट निहारो
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥1॥
बालि की त्रास कपीस बसै गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो
चौंकि महामुनि शाप दियो तब,
चाहिये कौन विचार विचारो
कै द्घिज रुप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के शोक निवारो
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥2॥
अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो
जीवत न बचिहों हम सों जु,
बिना सुधि लाए इहां पगु धारो
हेरि थके तट सिंधु सबै तब,
लाय सिया सुधि प्राण उबारो
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥3॥
रावण त्रास दई सिय को तब,
राक्षसि सों कहि सोक निवारो
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाय महा रजनीचर मारो
चाहत सीय अशोक सों आगि सु,
दे प्रभु मुद्रिका सोक निवारो
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥4॥
बाण लग्यो उर लक्ष्मण के तब,
प्राण तजे सुत रावण मारो
लै गृह वैघ सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु–बीर उपारो
आनि संजीवनी हाथ दई तब,
लक्ष्मण के तुम प्राण उबारो
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥5॥
रावण युद्घ अजान कियो तब,
नाग की फांस सबै सिर डारो
श्री रघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बन्धन काटि सुत्रास निवारो
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥6॥
बन्धु समेत जबै अहिरावण,
लै रघुनाथ पाताल सिधारो
देवहिं पूजि भली विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मंत्र विचारो
जाय सहाय भयो तबही,
अहिरावण सैन्य समैत संहारो
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥7॥
काज किये बड़ देवन के तुम,
वीर महाप्रभु देखि विचारो
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसो नहिं जात है टारो
बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होय हमारो
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥8॥

लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर।
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर ।

Saturday, 25 April 2015

प्रात: स्मरामि मन्त्र

प्रात: स्मरामि मन्त्र​: ​

करावलोकन​--

कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम​॥

पृथ्वी वंदना --

समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि ! नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥

प्रात​: स्मरणीय श्लोक —

श्रीगणेश​ जी --

प्रात​: स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं सिन्दूरपुरपरिशोभितगण्डयुग्मम्।
उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्डमाखण्डलादिसुरनायकवृन्दन्द्दम्॥

श्रीविष्णु --

प्रात​: स्मरामि भवभीतिमहार्तिनाशं नारायणं गरुडवाहनमब्जनाभम्।
महाभिभृतवरवारणमुक्तिहेतुं चक्रायुधं तरुणवारिजपत्रनेत्रम्॥

शंकर भगवान --

प्रात: स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं गड़्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम्।
खट्वाड़्गशूलवरदाभयहस्तमीश संसाररोगहरमौषध्म्द्वितीयम्॥

दुर्गा देवी ---

प्रात: स्मरामि शरदिन्दुकरोज्ज्वलाभाम सद्रत्नवन्मकरकुण्ड्लहारशोभाम ।
दिव्यायुधार्जितसुनीलसस्रहस्ताम रक्तोत्पलाभचरणां भवतीं परेशाम्॥

सूर्य​--

प्रात​: स्मरामि खलु तत्सुवितुर्वरेण्यम रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि।
सामानि यस्य किरणा: प्रभवादिहेतुं ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम्॥

नवग्रह​—

ब्रह्मामुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च​।
गुरुश्च शुक्र​: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥

ऋषि --

भृगुर्वसिष्ठ​: क्रतुरड़्गिराश्च मनु: पुलस्त्य​: पुलहश्च गौतम​:।
रैभ्यो मरीचिश्च्यवनश्च दक्ष​: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥

प्रकृति --

पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथाप​: स्पर्शी च वायुर्ज्वलितं च तेज​:।
नभ​: सशब्दं महसा सहैव कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥

भगवती लक्ष्मी --

या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी ।
या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी ॥
या रत्‍नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी ।
सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्‍च पद्‌मावती ॥

श्री बजरंग बाण

॥श्री बजरंग बाण॥

दोहा :

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

चौपाई :

जय हनुमंत संत हितकारी।
सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै।
आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा।
सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका।
मारेहु लात गई सुरलोका॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा।
सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा।
अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि संहारा।
लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई।
जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी।
कृपा करहु उर अंतरयामी॥
जय जय लखन प्रान के दाता।
आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
जै हनुमान जयति बल-सागर।
सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले।
बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा।
ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥
जय अंजनि कुमार बलवंता।
शंकरसुवन बीर हनुमंता॥
बदन कराल काल-कुल-घालक।
राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर।
अग्नि बेताल काल मारी मर॥
इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की।
राखु नाथ मरजाद नाम की॥
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै।
राम दूत धरु मारु धाइ कै॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा।
दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा।
नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं।
तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥
जनकसुता हरि दास कहावौ।
ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा।
सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं।
यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई।
पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता।
ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल।
ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
अपने जन को तुरत उबारौ।
सुमिरत होय आनंद हमारौ॥
यह बजरंग-बाण जेहि मारै।
ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
पाठ करै बजरंग-बाण की।
हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापैं।
तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥
धूप देय जो जपै हमेसा।
ताके तन नहिं रहै कलेसा॥

दोहा :

उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥